HRTC स्टाफ क्यों बन रहा सिरफिरे लोगों का निशाना? चंद महीनों में शिमला, नालागढ़ सहित 6 मारपीट के मामले उठा रहे सवाल

मंगलवार को नौ महीनों के बाद एशिया के सबसे ऊंचे सड़क मार्ग पर जब हिमाचल पथ परिवहन निगम की लेह-दिल्ली बस चली तो एक चित्र देखा। 1839 रुपये में 26 घंटे की यात्रा करवाने वाले चालक-परिचालक बहुत आत्म सम्मान और गर्व के साथ बस के आगे खड़े थे। बारालाचा के साथ और दर्रे भी लांघती है यह बस, लेकिन सबसे ऊंचा दर्रा संभवत: तांगलंग ला है जिसकी ऊंचाई 5,328 मीटर है।

जिस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, वह यह है कि जनजातीय, कठिन, शीत मरुस्थल और कहीं बर्फ से भरे क्षेत्रों में चालक परिचालक सुरक्षित रहते हैं, लेकिन कथित विकसित, शिक्षित, सभ्य क्षेत्र में उतरते ही उन पर हमले क्यों होने लगते हैं?

ओवरटेक करने पर पीट दिया एचआरटीसी ड्राइवर

शिमला में हाल में ‘हिमसुता’ यानी पथ परिवहन निगम की वोल्वो बस के चालक को हरियाणा के चार लोगों ने इसलिए पीट दिया कि उसने इन्हें ओवरटेक क्यों किया। वारदात शिमला शहर में हुई। निगम के चालक-परिचालक पहले भी पिटते आए हैं, कभी नालागढ़, कभी पंजाब में, कभी चंडीगढ़ में। कभी गुंडों से, कभी निजी बस संचालकों के लोगों से।

पिटना नई बात नहीं लेकिन इस बार बात इसलिए बढ़ी क्योंकि चालक को छह टांके लगवाने पड़े। शिमला शहर की बात थी, चालक पर आई आपदा वस्तुत: यात्रियों के पास लाइव घटना की रील बनाने का दुर्लभ अवसर था, इसलिए घटना प्रसारित हो गई। पुलिस कार्रवाई इसलिए भी हुई क्योंकि कर्मचारी हड़ताल पर बैठ गए, चक्काजाम कर दिया।

नालागढ़ में भी हुई मारपीट पर नहीं हुआ केस

यह प्रश्न अनुत्तरित है कि हाल में नालागढ़ में भी निगम के स्टाफ के साथ ऐसी मारपीट हुई थी। वहां शायद इसलिए विरोध नहीं हुआ क्योंकि चालक वोल्वो का नहीं, गांव के रूट की साधारण बस का था।

चंद महीनों में 6 मारपीट के मामले

कुलमिला कर अक्टूबर 2025 से अब तक छह प्रमुख मामले मारपीट के हुए हैं। क्या यहां भी वर्ग विभेद है? ‘सजग साधना सविनय सेवा’ के लिए जानी जाती एचआरटीसी अपने इस सूत्रवाक्य पर खरी भी उतरी है। लेकिन अब इसका इकबाल लड़खड़ाता प्रतीत होता है। निगम इस प्रकार के मनोवैज्ञानिक झटकों से ही नहीं, आर्थिक झटकों से भी गुजर रहा है।

सिरफिरों से मार खाने वाला वर्ग वेतन के लिए जूझ रहा

सड़क पर किसी भी सिरफिरे से मार खाने वाला यह वर्ग वेतन के लिए जूझ रहा है, पेंशन के लिए जूझ रहा है, मेडिकल रिएंबर्समेंट तो भूल ही जाएं, 80 महीनों से रात्रि भत्ता या ओवरटाइम नहीं मिला।

भोंपू हार्न बजाने वाली बसें हिंदी फिल्मों में भी दिखी

जब हिमाचल प्रदेश क्लास सी स्टेट बना तो पंजाब, रेलवे और हिमाचल प्रदेश ने मिल कर कुल्लू-मंडी ट्रांसपोर्ट की स्थापना की ताकि पंजाब और हिमाचल के बीच आवागमन की सार्वजनिक सुविधा हो। कुल्लू-मनाली मार्ग पर उस समय की, लंबे नाक वाली, भोंपू हार्न बजाने वाली बसें हिंदी फिल्मों में भी दिखी हैं। 1966 में जब पुनर्गठन हुआ तो हिमाचल पथ परिवहन निगम की स्थापना हुई। इन सरकारी बसों ने पूरे हिमाचल को जोड़ा…एचआरटीसी बस को जांबाज चालक कैसे कठिनतम मार्गों पर चलाते हैं, इन्स्टाग्राम पर कुछ रील्स यह भी दिखाती हैं। हाल में निगम ने 50 वर्ष पूरे करने पर एक काफी टेबल बुक भी प्रकाशित की थी, जो ‘अंग्रेजी’ में थी।

घाटे में डूबे निगम पर डीजल की मार

अब एचआरटीसी का हाल क्या है? पश्चिम एशिया का संघर्ष ताजा है, एचआरटीसी पहले से घाटे को जी रही है। अब 2200 करोड़ रुपये के घाटे में डूबे निगम पर महंगे डीजल की मार पड़ रही है। एचआरटीसी प्रतिमाह 35 से 36 करोड़ रुपये डीजल पर खर्च करता है, जबकि इसकी 3200 बसें प्रतिदिन 5.60 लाख किलोमीटर का सफर तय करती हैं। निगम पर सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने से घाटा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।

एचआरटीसी में दो संसार

दरअसल एचआरटीसी में दो संसार हैं। एक वह जो सड़कों पर निगम के लिए लड़ता है, मार खाता है। दूसरा वह जिसे सब हरा दिखता है। शासक हों या प्रशासक। किसी भी मुख्य स्टेशन पर निजी बस वालों को टाइम फालो करने के लिए कहते हुए जो लोग लड़ते हैं, वही मार खाते हैं। कहते भी हैं, ‘सर हम तो झगड़ा करते हैं निगम का एक एक रुपया बचाने के लिए, पर अफसरों का क्या करें। आरटीओ साहब भी कोई चीज होते हैं। उन्हें कई कुछ देखना होता है।’ बात में दम है। एक साहब तो इतने अच्छे आरटीओ थे कि हर दल की सरकार ने उन्हें आरटीओ ही रखा। गलती से एसडीएम या कुछ बने भी तो अंतत: आरटीओ बन कर ही चैन पाया। अब ज्ञान का आलोक कर रहे हैं।

प्रदेश के हर कस्बे से दिल्ली के लिए निजी लग्जरी बसें भी चलती हैं। ये टैक्सी परमिट हैं। स्टेज कैरिज नहीं। निगम के हर डिपो को इनके संचालन से ही हर माह चार से पांच लाख रुपये की चपत लग रही है। मगर, अधिकारी और नीति नियंता क्या यह सब नहीं जानते होंगे? सरकारी बसें किसी भी मोड़ पर रुकती हुई, निढाल दिखती हैं…उन स्त्रियों की तरह जिन्हें जमाने भर का काम होता है, वे हारना नहीं चाहती…पर एक सीमा होती है। ऐसे में हरियाणा की बसें हीनता की भावना उपजाती हैं।

ऊपर के संसार में वर्कशाप प्रबंधक,  ट्रैफिक प्रबंधक, क्षेत्रीय प्रबंधक, मंडलीय प्रबंधक, सहायक महाप्रबंधक, महाप्रबंधक, मुख्य महाप्रबंधक….सब हैं। बस प्रबंधन गायब है। चार वर्षों से कोई बस नहीं खरीदी गई। जो हैं, उनके पुर्जे नहीं हैं, टायर, ल्यूब्रिकेंट सब का अभाव है और नीयत का भी। उठो एचआरटीसी, तुम्हें जीना है।

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