कहीं हर बहस की जड़ आप ही तो नहीं? झगड़े सुलझाने के बजाय उलझा रही हैं आपकी ये 7 आदतें

 क्या हर बार किसी भी झगड़े के बाद आपके दिमाग में भी एक ही ख्याल आता है कि पूरी गलती सामने वाले की थी? जब भी हमारी किसी से बहस होती है, तो हमारी उंगली तुरंत सामने वाले की गलतियों की तरफ उठ जाती है, लेकिन क्या आपने कभी उस झगड़े के बाद शांत दिमाग से सोचा है कि कहीं इस कहानी के विलेन आप खुद तो नहीं?

सच तो यह है कि कई बार अनजाने में हम ही वो इंसान बन जाते हैं, जो झगड़े को सुलझाने के बजाय उलझा रहा होता है। आइए जानते हैं वो संकेत जो बताते हैं कि हर बार गलती सिर्फ सामने वाले की नहीं होती।

हमेशा और कभी नहीं जैसे शब्दों का इस्तेमाल

बहस के दौरान हमेशा या कभी नहीं जैसे शब्द असली मुद्दे से भटका देते हैं। दूसरे व्यक्ति पर तुम हमेशा ऐसा करते हो या तुम कभी ऐसा नहीं करते जैसे इलजाम लगाना, उसे डिफेंसिव बना देता है। इसलिए कोशिश होनी चाहिए कि आप बहस के बीच असली मुद्दे पर ही रहें और ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने से बचें।

व्यवहार के बजाय पर्सनैलिटी पर हमला

एक बड़ी गलती यह होती है कि हम सामने वाले के काम के बारे में बात करने के बजाय उसके कैरेक्टर या पर्सनैलिटी पर हमला करने लगते हैं। जब किसी की आइडेंटिटी पर अटैक करते हैं, तो वह व्यक्ति तुरंत खुद को बचाने की कोशिश में और डिफेंसिव हो जाता है।

पुरानी बातों का हिसाब रखना

रिश्तों में हिसाब-किताब रखना उसे और मुश्किल बना देता है। अक्सर लोग लड़ाई के बीच पुरानी गलतियों की लिस्ट निकाल लेते हैं। पुरानी बातें कुरेदने से असली प्रॉब्लम सॉल्व होने के बजाय एक नई लड़ाई शुरू हो जाती है।

अपने और दूसरों के लिए अलग नियम

अक्सर हम अपने कड़वे लहजे को थकान या तनाव का नाम देकर सही ठहरा देते हैं, लेकिन अगर सामने वाला उसी लहजे में बात करे, तो हमें बुरा लग जाता है।

हर रिश्ते में तनाव

अगर आपकी हर दोस्ती या हर रिश्ते में विवाद ही रहता है, तो सोचने की जरूरत है। कभी-कभी लोग अनजाने में विवाद इसलिए पैदा करते हैं क्योंकि उन्हें उस छोटे-मोटे झगड़ों से इमोशनल सैटिसफेक्शन मिलता है। इस पैटर्न को पहचानना बदलाव की पहली सीढ़ी है।

गुस्से के आगे सब भूल जाना

अक्सर गुस्से में हमें सिर्फ हमारी बात सही लगती है। झगड़े को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों को नजरिया समझने की जरूरत होती है। सिर्फ अपनी बात पर अड़े रहना समस्या को बढ़ाता है।

हर बात पर सफाई देना

जब हम डिफेंसिव हो जाते हैं, तो हमारा दिमाग सामने वाले की बात सुनना बंद कर देता है। जैसे ही आपको महसूस हो कि आप स्ट्रेस में हैं और सुनने की स्थिति में नहीं हैं, तो थोड़ा रुकें। थोड़ी देर बात इस बारे में बात करें और ठंडे दिमाग से प्रॉब्लम के बारे में सोचें।

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