वह दिन दूर नहीं जब आप अपने गांव की 225 साल पुरानी तस्वीर से रुबरु हो पाएंगे। आप यह भी जान पाएंगे कि उस समय आपके गांव की दशा व दिशा क्या थी? गांवों की स्थिति, वहां की समस्या, खेतीबाड़ी सहित उस परिक्षेत्र की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व धार्मिक धरोहर से भी आप पलक झपकते अवगत हो पाएंगे।
संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की पहल से जिले में प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का कार्य चल रहा है। इसी कड़ी में जिला अभिलेखागार में प्राचीन विलेज सर्वे रिपोर्ट को भी सहेज कर इसे डिजिटल रुप देने का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है।
जिला अभिलेखागार में सन 1800 की हस्तलिखित सर्वे रिपोर्ट भी मौजूद है। इसके अलावा 1901 व फिर 1954 के विलेज नोट को भी सहेजकर रखा गया है और अब मंत्रालय द्वारा इन पांडुलियों को सहेजने का कार्य आरंभ कर दिया गया है।
जिलाधिकारी अंशुल कुमार की लगातार मॉनिटरिंग व जिला अभिलेखागार पदाधिकारी डॉ. जयशंकर कुमार की गहरी दिलचस्पी से गांव की पुरानी कहानी जिंदा हो रही है। सन 1800 की सर्वे रिपोर्ट में उस समय के गांवों की पूरी कहानी दर्ज है।
गांव तक पहुंचने के दुर्गम रास्ते, एक कुंआ से पूरी बस्ती की बुझती प्यास, शाम ढलते ही छाने वाला धुप अंधेरा, इलाके की हरियाली सहित हर चीज इस सर्वे रिपोर्ट में मौजूद है। हाल में पूर्णिया पहुंची विश्व बैंक की पांच सदस्यीय टीम भी जिला अभिलेखागार पहुंची थी और पांडुलिपियों का अध्ययन भी की थी।
बदले गांव के बीच रोचक है कहानी
सर्वे रिपोर्ट में हर गांव की अलग-अलग कहानी है। केनगर प्रखंड का गंगेली पंचायत अब विकसित पंचायतों में शुमार है। सर्वे रिपोर्ट में इस गांव की दुष्कर तस्वीर कैद है। लोग पांच-पांच कोस की पैदल यात्रा कर इस गांव तक पहुंचते थे।
गांव में खेतीबाड़ी ही जीने का एक मात्र माध्यम था। खेती में भी कुर्थी, मरुआ व कुछ हद तक धान की खेती होती थी। अब यहां मक्का व मखाना की खेती होती है। गांव में एक भी पक्का का मकान नहीं था। एक कुंआ से सबकी प्यास बुझती थी।
अधिकांश लोग बगल से गुजरते धार व नदी में ही स्नान करते थे। शिक्षा की स्थिति दयनीय थी। शाम ढलते ही सियार के बोलने की आवाज शुरु हो जाती थी। पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता था।
अब गांव की तस्वीर बदल चुकी है। गांव के 85 वर्षीय मुखाय सिंह व श्रीनाथ ठाकुर बताते हैं कि सर्वे रिपोर्ट पूरी तरह सही है। यह तो नया गांव है। पुराना गांव उनकी आंखों में बसा है।
सड़कों का हाल, चहुंओर जंगल, जंगली जानवरों का खतरा उन लोगों ने भी देखा है। इसी तरह की हर राजस्व ग्राम की अपनी कहानी है।
राज घरानों से भी संपर्क साध प्राप्त की जा रही पांडुलिपियां
पांडुलिपियों के सहेजने की दिशा में जिला कला एवं संस्कृति विभाग भी हर स्त्रोत तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है। जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज कुमार पटेल भी लगातार पूर्व के राज घरानों से संपर्क कर उनके पास मौजूद पांडुलिपियों का भी संग्रह कर रहे हैं।
इस मामले को लेकर चंपानगर स्टेट व बनैली स्टेट के लोगों से भी संपर्क साधा गया है।


