वृंदावन की पावन धरती पर स्थित मां कात्यायनी (Maa Katyayni) शक्तिपीठ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था और प्रेम का वो केंद्र है। जहां, स्वयं राधा रानी और गोपियों ने तपस्या की थी।
वृंदावन का नाम आते ही मन में बांके बिहारी की छवि उभरती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रज भूमि की रक्षा और यहां की अधिष्ठात्री देवी स्वयं मां कात्यायनी हैं? वृंदावन के राधा बाग इलाके में स्थित यह शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु (Bhagwan Vishnu) ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के हिस्से किए थे, तब यहां देवी के ‘केश’ (बाल) गिरे थे। इसी कारण इस स्थान को ‘उमा शक्तिपीठ’ भी कहा जाता है।
हिमालय की तपस्या और मंदिर का निर्माण
इस भव्य मंदिर का इतिहास भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। सन् 1923 में स्वामी केशवानंद महाराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। स्वामी जी ने 33 सालों तक हिमालय की कंदराओं में कठिन साधना की थी। अपनी साधना के दौरान उन्हें एक दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, जिसमें उन्हें वृंदावन में इस लुप्त शक्तिपीठ को ढूंढने और मंदिर स्थापित करने का आदेश मिला। योगबल से उन्होंने इस स्थान को पहचाना और आज यह भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है।
मंदिर की बनावट और अष्टधातु की प्रतिमा
सफेद संगमरमर से बना यह मंदिर देखने में अत्यंत भव्य है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो सुनहरे शेर खड़े हैं, जो माता की शक्ति का अहसास कराते हैं। गर्भगृह में मां कात्यायनी की अष्टधातु से बनी विशाल प्रतिमा विराजमान है। मां की चार भुजाएं हैं:


