हौसलों की ऊंची उड़ान, जब बादलों के बीच लिखी गई डर पर जीत की कहानी

‘परिंदों को मिलेगी मंजिल एक दिन, ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं, और वही लोग रहते हैं खामोश अक्सर, जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं।’ अनंत नीला आकाश, बादलों की लुका-छिपी और परिंदों की तरह हवाओं के सीने को चीरते हुए उड़ान भरने का वो आदिम मानवीय स्वप्न—अब जमशेदपुर की धरती पर हकीकत बनकर उतरा है।

झारखंड पर्यटन और स्काईहाई इंडिया के साझा प्रयासों ने सूबे के पर्यटन इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। सोनारी एयरपोर्ट इन दिनों केवल विमानों की गड़गड़ाहट का नहीं, बल्कि इंसानी हौसलों की गूंज का गवाह बन रहा है।

साहस की पराकाष्ठा : 10,000 फीट से मौत को मात

जब विमान 10,000 फीट की ऊंचाई पर पहुंचता है और उसका दरवाजा खुलता है, तो सामने केवल शून्य होता है। ठंडी हवा का एक झोंका रूह को छू जाता है और धड़कनें अपनी रफ़्तार भूल जाती हैं, लेकिन जैसे ही टैंडम जंप के जरिए प्रशिक्षक के साथ जांबाज आसमान में छलांग लगाते हैं, डर का स्थान एक असीम उल्लास ले लेता है। यह केवल एक छलांग नहीं, बल्कि डर पर जीत का वो लम्हा है जिसे शब्दों में पिरोना कठिन है।

इस साहसिक उत्सव के सूत्रधार और अंतरराष्ट्रीय गोल्फर दिग्विजय सिंह बताते हैं कि पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार का सहयोग इस आयोजन की रीढ़ रहा है।

उनके अनुसार, यह पहल झारखंड को वैश्विक एडवेंचर टूरिज्म के मानचित्र पर मजबूती से स्थापित करेगी। सोनारी एयरपोर्ट पर यह रोमांच 21 से 30 मार्च तक जारी रहेगा, जिसके बाद 1 से 6 अप्रैल तक दुमका का आसमान इन मानव परिंदों से गुलजार होगा।

अनुभवों की जुबानी: डर से जीत तक

आसमान से जमीं का दीदार करने वाले निशांत कुजूर और अजिता कुलकर्णी के चेहरों पर एक अलग ही चमक थी। अजिता कहती हैं, ऊपर से जमशेदपुर का नजारा किसी जन्नत से कम नहीं था। शुरुआत में झिझक थी, लेकिन गिरने के अहसास ने उड़ने के जुनून में बदलते ही सब कुछ भुला दिया।

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