यही कारण रहा कि इस बटालियन की क्रूरता कई बार रोंगटे खड़े कर देने वाली बनी- ताड़मेटला में 76 जवानों के बलिदान के बाद शवों के बीच जश्न और झीरम कांड में महेंद्र कर्मा की हत्या के बाद ¨हसक उत्सव, संवेदनहीनता की चरम अभिव्यक्ति थी।

नेतृत्व सुरक्षित, मोर्चे पर बस्तरिया चेहरे

बटालियन की रणनीति भी उतनी ही निर्मम थी। केसा के अनुसार, बड़े हमलों की योजना शीर्ष नेतृत्व बनाता, जबकि मुठभेड़ में वे पीछे रहते। देवजी और सन्नू दादा उर्फ गोपन्ना शायद ही मोर्चे पर दिखते, जबकि हिड़मा कड़े सुरक्षा घेरे में रहता था। अग्रिम पंक्ति में गांवों से लाए गए युवा होते, जो सबसे पहले गोलियों का सामना करते और सबसे ज्यादा हताहत होते।

बटालियन का अनुशासन भय और अविश्वास पर टिका था। हिड़मा का इतना खौफ था कि सदस्य उससे सीधे संवाद से बचते। वह दूरी बनाए रखता, साथ खाना तक नहीं खाता था। सुकमा के पूवर्ती गांव का हिड़मा, जो कभी मवेशी चराता था, माओवादियों के साथ जाकर समय के साथ कुख्यात कमांडर बन गया।

हिड़मा के मारे जाने के बाद टूटी बटालियन

 

कभी 300 हथियारबंद माओवादियों वाली यह बटालियन संगठन की रीढ़ थी। 2019 तक इसका ठिकाना किस्टाराम के जंगल रहे, लेकिन सुरक्षा बल के बढ़ते दबाव में यह लगातार पीछे हटती गई।

2023 में गढ़ छोड़ना पड़ा और जनवरी 2025 में कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में डेरा डालने के बाद भी दबाव बना रहा, जिससे बटालियन कई हिस्सों में बंट गई। 18 नवंबर को आंध्र प्रदेश के मारेडुमिली के जंगल में हिड़मा के मारे जाने के बाद इसका मनोबल टूट गया और अब इसके अधिकांश सदस्य समर्पण कर चुके हैं।