यूजीसी द्वारा हाल ही में लागू किए गए समता कानून को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। इस कानून के तहत सरकारी कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों में समता समिति (इक्विटी कमेटी) गठित करने का प्रावधान किया गया है। जहां सवर्ण वर्ग इसके विरोध में उतर आया है, वहीं इस विरोध ने राजनीतिक हलचल भी बढ़ा दी है।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए यूजीसी के फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि इस कानून का विरोध करने वाले केवल जातिवादी मानसिकता के लोग हैं, जो इसे षड्यंत्रकारी बताकर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तीन बिंदुओं में अपनी बात रखी। उन्होंने लिखा कि देश की उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव को समाप्त करने और समाधान की दिशा में यूजीसी का यह कदम सही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे अपने विरुद्ध भेदभाव मानने वाले लोग वास्तव में जातिवादी सोच से प्रेरित हैं और उनका विरोध अनुचित है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूजीसी के इस नए नियम से उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और न्याय का माहौल बनाने की कोशिश होगी। हालांकि, विरोध करने वाले वर्ग का कहना है कि यह प्रावधान उनके अधिकारों के खिलाफ है। इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में और अधिक राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिल सकती है।


