वाराणसी के शाहंशाहपुर स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) में खेती को लेकर सोच और दृष्टिकोण तेजी से बदल रहा है। यहां वैज्ञानिक यह साबित करने में जुटे हैं कि कृषि केवल रसायनों और कीटनाशकों पर निर्भर नहीं है। बल्कि प्रकृति में मौजूद अद्भुत शक्ति को समझकर किसान न सिर्फ अधिक उत्पादन कर सकते हैं, बल्कि मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की भी रक्षा कर सकते हैं।
संस्थान में चल रहा शोध इस बात को रेखांकित करता है कि टिकाऊ खेती का रास्ता प्राकृतिक संसाधनों और जैविक प्रक्रियाओं से होकर गुजरता है। यही सोच भारत को एक नए कृषि युग की ओर ले जा रही है।
मल्टीओमिक्स आधारित शोध IIVR में हो रहा शोध आधुनिक विज्ञान की तकनीक मल्टीओमिक्स पर आधारित है। इस तकनीक के माध्यम से पौधों के जीन, प्रोटीन और उनके द्वारा बनाए जाने वाले प्राकृतिक रसायनों का गहन अध्ययन किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन जैविक तत्वों को समझकर फसल उत्पादन को बेहतर बनाया जा सकता है और साथ ही रासायनिक निर्भरता को कम किया जा सकता है।
कृषि में संभावनाएं
- मल्टीओमिक्स रिसर्च से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के नए रास्ते खुलेंगे।
- किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन का अवसर मिलेगा।
- मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।
- मानव स्वास्थ्य पर रसायनों के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकेगा।
निष्कर्ष भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान में हो रहा यह शोध कृषि को एक नई दिशा देने वाला है। यह न केवल किसानों के लिए लाभकारी साबित होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ खेती का आधार भी बनेगा।


