शराब पीने पर टोकने से बेटे की मौत, झारखंड हाईकोर्ट ने पिता की उम्रकैद की सजा घटाई; गैर-इरादतन हत्या माना मामला

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झारखंड हाईकोर्ट ने बेटे की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक बुजुर्ग पिता को बड़ी कानूनी राहत दी है। मामला घर में शराब पीने को लेकर पिता और बेटे के बीच हुए विवाद से जुड़ा है। निचली अदालत ने पिता को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने घटना की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अपराध की श्रेणी बदल दी। अदालत ने हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या का मामला मानते हुए सजा को पहले से जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, नवंबर 2013 में गोमा गोप और उनके बेटे प्रताप गोप के बीच शराब पीने को लेकर विवाद हुआ था। बताया गया कि पिता घर में हड़िया पी रहे थे, जिस पर बेटे ने आपत्ति जताई। इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई और विवाद के दौरान बेटे की मौत हो गई।

मामले की जांच के बाद पुलिस ने कानूनी कार्रवाई की। इसके बाद निचली अदालत में मुकदमा चला और अगस्त 2018 में चाईबासा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने गोमा गोप को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में दी गई फैसले को चुनौती

निचली अदालत के फैसले के खिलाफ गोमा गोप ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले के तथ्यों, चिकित्सा साक्ष्यों और घटना की परिस्थितियों पर विचार किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि विवाद अचानक हुआ था और उपलब्ध साक्ष्यों से हत्या की पूर्व योजना साबित नहीं हुई। अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए माना कि मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 300 के अपवाद-4 के अंतर्गत आता है।

हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या माना

हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 से बदलकर धारा 304 भाग-II के तहत कर दिया। इस बदलाव का मतलब है कि अदालत ने अपराध को हत्या के बजाय हत्या की श्रेणी में नहीं आने वाली गैर-इरादतन हत्या माना।

अदालत ने मामले की परिस्थितियों के आधार पर यह कानूनी निष्कर्ष निकाला। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर अचानक हुए विवाद में किसी की मौत होने पर अपराध गैर-इरादतन हत्या ही माना जाएगा। इसका निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होता है।

बुजुर्ग की उम्र और जेल में बिताए समय पर विचार

सजा तय करते समय अदालत ने आरोपी की उम्र और जेल में बिताई गई अवधि को भी ध्यान में रखा। रिपोर्टों के अनुसार, सुनवाई के समय गोमा गोप की उम्र करीब 88 वर्ष थी और वह लगभग 13 साल से जेल में थे।

हाईकोर्ट ने सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया। साथ ही, किसी अन्य मामले में हिरासत की जरूरत नहीं होने पर उनकी रिहाई का आदेश दिया।

कानूनी फैसले का क्या है महत्व?

यह फैसला हत्या और गैर-इरादतन हत्या के बीच कानूनी अंतर को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। कानून के तहत किसी घटना में मौत होना अपने आप में यह तय नहीं करता कि अपराध हत्या की श्रेणी में आएगा या गैर-इरादतन हत्या की। घटना के पीछे की परिस्थितियां, आरोपी का इरादा, जानकारी और उपलब्ध साक्ष्य अहम भूमिका निभाते हैं।

निष्कर्ष:

झारखंड हाईकोर्ट ने बेटे की मौत के मामले में बुजुर्ग पिता की उम्रकैद की सजा घटाते हुए दोषसिद्धि की श्रेणी में बदलाव किया। अदालत ने अचानक हुए विवाद, उपलब्ध साक्ष्यों और आरोपी की उम्र सहित विभिन्न परिस्थितियों पर विचार किया। करीब 13 साल की कैद के बाद सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित करने का आदेश दिया गया।

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