जालौन: उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के कोंच की रामलीला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि करीब पौने दो सदी पुरानी सांस्कृतिक विरासत है। इसकी शुरुआत वर्ष 1852 में कोंच से करीब तीन किलोमीटर दूर ग्राम पड़री में हुई थी। समय के साथ यह रामलीला कोंच नगर तक पहुंची और आज भी अपनी कई पुरानी परंपराओं को जीवंत रखे हुए है।
कंधों पर कलाकारों को लाने से शुरू हुई परंपरा
कोंच की रामलीला की खास पहचान इसकी चलायमान लीलाएं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जब ग्राम पड़री में रामलीला का मंचन होता था, तब कोंच के साहित्यकारों और रामलीला प्रेमियों की इच्छा थी कि इस आयोजन को नगर में भी लाया जाए। इसके बाद कलाकारों को कंधों पर बैठाकर कोंच लाने की परंपरा शुरू हुई।
समय के साथ कंधों पर कलाकारों को ले जाने की परंपरा भले बदल गई, लेकिन रामलीला के चलायमान स्वरूप को आज भी रथों के जरिए कायम रखा गया है। यानी पात्र रथों पर सवार होकर अलग-अलग स्थानों पर होने वाली लीलाओं का हिस्सा बनते हैं।
आज भी कई प्रमुख लीलाएं चलायमान
बदलते समय के साथ कोंच की रामलीला की कई लीलाएं मंच पर होने लगी हैं, लेकिन कुछ प्रमुख प्रसंग आज भी पारंपरिक चलायमान शैली में प्रस्तुत किए जाते हैं। इनमें राम वनगमन और सरयू पार लीला, मारीच वध, जटायु-रावण युद्ध तथा रावण-मेघनाद वध जैसे प्रसंग शामिल हैं।
मैदानी लीलाओं के लिए भी अलग-अलग स्थान निर्धारित हैं। सरयू पार लीला सागर तालाब के पास, मारीच वध गढ़ी के समीप मैदान में और रावण-मेघनाद वध की लीला धनुताल के पास दशहरा मैदान में आयोजित की जाती है।
174 साल बाद भी कायम है जनसहभागिता
कोंच की रामलीला की एक खास बात यह भी है कि इसका आयोजन लंबे समय से जनसहयोग से होता आया है। शुरुआत में जब रामलीला के लिए स्थायी मंच नहीं था, तब बाग-बगीचों और खुले स्थानों में लीलाओं का मंचन किया जाता था। नगर के विभिन्न वर्गों के लोग इसमें भाग लेते रहे और समय के साथ यह आयोजन पूरे नगर की साझा सांस्कृतिक विरासत बन गया।
रामलीला के संचालन में स्थानीय धार्मिक संस्था धर्मादा रक्षिणी सभा की भी महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। स्थानीय कलाकार ही अलग-अलग पात्रों का अभिनय करते हैं। खास बात यह है कि अपना मंच बनने के बाद भी आयोजन ने अपनी पुरानी मैदानी और चलायमान परंपराओं को पूरी तरह नहीं छोड़ा है।
रामलीला के पात्रों को घरों में भोजन कराने की परंपरा
कोंच की रामलीला से जुड़ी एक और परंपरा लोगों के बीच आपसी जुड़ाव को दर्शाती है। रामलीला के दौरान श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत और शत्रुघ्न की भूमिका निभाने वाले कलाकारों को लोग बगीचों और अपने घरों पर भोजन के लिए आमंत्रित करते हैं।
यही परंपराएं कोंच की रामलीला को महज मंचन से अलग एक सामुदायिक आयोजन का स्वरूप देती हैं। करीब 174 वर्षों से चली आ रही यह रामलीला बदलते दौर के साथ नए रंगमंचीय रूपों को अपनाते हुए भी अपनी पुरानी पहचान और चलायमान परंपरा को संजोए हुए है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

