भारत नहीं, अफ्रीका में पहली बार गूंजा था ‘वैष्णव जन तो…’, 500 साल पुरानी है गांधीजी से जुड़े इस भजन की कहानी

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महात्मा गांधी से गहराई से जुड़े भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ को आज भारत में व्यापक रूप से जाना जाता है। यह भजन गांधीजी की प्रार्थना सभाओं का अहम हिस्सा रहा, लेकिन इसकी कहानी गांधीजी के समय से कई सदियों पहले शुरू हो चुकी थी। करीब 500 साल पुराने इस भजन के रचयिता गुजरात के संत-कवि नरसिंह मेहता माने जाते हैं।

नरसिंह मेहता ने की थी रचना

‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ की रचना 15वीं सदी के संत और कवि नरसिंह मेहता से जुड़ी मानी जाती है। भजन में सच्चे वैष्णव के गुणों का वर्णन किया गया है। इसमें दूसरों के दुख को समझने, अहंकार से दूर रहने और परोपकार की भावना को महत्व दिया गया है।

भजन की यही मानवीय और नैतिक भावना बाद में महात्मा गांधी के विचारों से भी मेल खाती दिखाई दी। यही वजह रही कि यह गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में नियमित रूप से गाया जाने लगा।

गांधीजी से कैसे जुड़ा यह भजन?

महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान भारतीय भजनों और धार्मिक गीतों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। ‘वैष्णव जन तो’ भी बाद में गांधीजी के आश्रम जीवन और प्रार्थना सभाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

हालांकि, भजन की लोकप्रियता का श्रेय केवल गांधीजी को देना सही नहीं होगा। इसकी रचना उनसे कई सदियां पहले हो चुकी थी। गांधीजी ने इसे अपनी आध्यात्मिक और सामाजिक सोच के अनुरूप विशेष महत्व दिया।

अफ्रीका से जुड़ी है लोकप्रियता की कहानी

गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के कारण इस भजन की कहानी भारत के बाहर भी पहुंची। दक्षिण अफ्रीका में उनके सार्वजनिक जीवन और प्रार्थना सभाओं के दौरान भारतीय भजनों का गायन होता था। इसी संदर्भ में ‘वैष्णव जन तो’ का नाम भी गांधीजी के साथ जुड़ता चला गया।

समय के साथ यह भजन गांधीजी की अहिंसा, करुणा और मानवता की विचारधारा का प्रतीक बन गया। हालांकि इसके शुरुआती गायन और अफ्रीका में पहली बार गूंजने से जुड़े दावों को अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

500 साल बाद भी कायम है लोकप्रियता

नरसिंह मेहता की रचना आज भी भारतीय भक्ति परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है। गांधीजी के साथ जुड़ने के बाद इसकी पहचान देश-दुनिया में और व्यापक हुई। यही वजह है कि करीब पांच सदियां बीतने के बावजूद ‘वैष्णव जन तो’ आज भी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में याद किया जाता है।

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