चाय की केतली से उठते सपनों की भाप, गोरखपुर की तीन बहनें ऐसे बुन रही हैं IAS बनने का सपना
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गेट के सामने सुबह चाय की केतली चढ़ती है तो उसके साथ तीन बहनों के सपने भी उबलने लगते हैं। कोई चाय का आर्डर देता है, कोई मैगी मांगता है और इसी बीच वर्तिका, वंदिता और अवंतिका की निगाहें अपने आने वाले कल पर टिकी रहती हैं। महराजगंज की रहने वाली इन तीन सगी बहनों के लिए ‘विलिवर विस्ट्रो’ सिर्फ चाय का स्टाल नहीं, बल्कि संघर्ष के बीच अपने पैरों पर खड़े होने और सपनों को जिंदा रखने का जरिया है।
वर्ष 2017 में पिता राम सकल उपाध्याय को लकवा पड़ने के बाद परिवार की परिस्थितियां बदल गईं। इलाज और दवाइयों का खर्च बढ़ा तो घर की जिम्मेदारियां भी बढ़ती चली गईं। तीनों बहनों ने हालात को अपनी पढ़ाई के रास्ते में दीवार नहीं बनने दिया। करीब तीन महीने पहले महज आठ हजार रुपये जुटाकर विवि गेट के सामने चाय का स्टाल शुरू किया। धीरे-धीरे मैगी भी मेन्यू में जुड़ गई।
दुकान सुबह सात बजे खुलती है और शाम सात बजे तक चलती है। दिनभर ग्राहकों के लिए चाय तैयार करने के बाद जब दुकान बंद होती है तो तीनों की दूसरी पारी शुरू होती है। कुछ समय सुबह पढ़ाई के लिए निकालती हैं और रात 10 बजे से दो बजे तक किताबों और नोट्स के साथ बैठती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में एआइ और यूट्यूब भी उनका सहारा हैं। किसी सवाल पर अटकने पर इन्हीं माध्यमों से अपनी जिज्ञासा शांत करती हैं।
वर्तिका और वंदिता कहती हैं कि तीनों साथ रहती हैं, इसलिए दुकान संभालने में एक-दूसरे का सहारा मिल जाता है। दुकान से होने वाली कमाई पिता की दवाइयों और घर की जरूरतों में मदद करती है। इससे पढ़ाई भी जारी है और किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। संघर्ष के सवाल पर उनका जवाब भी उतना ही सहज है, जितना उनका रोज का काम बचपन से संघर्ष में रहे हैं, इसलिए अब थकान नहीं लगती। पहले लगती थी, लेकिन अब आदत हो गई है। उम्मीद है, एक न एक दिन सफलता जरूर मिलेगी।
विवि गेट से गुजरने वाले लोग यहां कुछ मिनट रुककर चाय पीते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। मगर इसी छोटी-सी दुकान पर तीन बहनें अपने जीवन की बड़ी कहानी लिख रही हैं। दिन में हाथ चाय की केतली थामते हैं और रात में वही हाथ किताबों के पन्ने पलटते हैं। इनके लिए यह दुकान मंजिल नहीं, उस रास्ते का पहला पड़ाव है जहां एक दिन चाय की प्यालियों की जगह जिम्मेदारियों की बड़ी कुर्सी का सपना साकार होना है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

