तृणमूल कांग्रेस में सांसदों और विधायकों के बड़े पैमाने पर अलग होने की घटनाओं की चर्चा अब देश की सीमाओं से बाहर भी पहुंच गई है। कई अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों ने इस राजनीतिक संकट पर विस्तृत विश्लेषण प्रकाशित करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी की वर्तमान स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
रिपोर्टों में ममता बनर्जी को एक जुझारू और संघर्षशील नेता बताया गया है, जिन्होंने लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद तृणमूल कांग्रेस को खड़ा किया था। हालांकि, कई विश्लेषणों में कहा गया है कि पार्टी के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया सीमित होने और पुराने नेताओं की उपेक्षा से असंतोष बढ़ता गया।
विदेशी मीडिया की रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि चुनावी रणनीति तय करने में बाहरी सलाहकारों की बढ़ती भूमिका के कारण जमीनी कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ी। इससे संगठन के भीतर असहमति गहराती गई और अंततः बड़े पैमाने पर राजनीतिक टूट सामने आई।
रिपोर्टों में सांसदों और विधायकों के एक साथ अलग होने को भारतीय राजनीति की बड़ी घटनाओं में से एक बताया गया है। साथ ही डा. काकोली घोष दस्तीदार और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में सामने आए विरोध तथा अभिषेक बनर्जी से जुड़े कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले की जांच का भी उल्लेख किया गया है।
बड़े राजनीतिक नुकसान का करना पड़ सकता है सामना
कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। रिपोर्टों में कहा गया है कि पार्टी को संगठनात्मक एकता बनाए रखने और जनता का भरोसा फिर से हासिल करने के लिए बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
विदेशी मीडिया ने अपने निष्कर्ष में लिखा है कि तृणमूल के भीतर का यह संकट केवल नेतृत्व का नहीं, बल्कि संगठन के भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन गया है। कई रिपोर्टों में आशंका जताई गई है कि यदि असंतोष को जल्द नहीं रोका गया तो पार्टी को और बड़े राजनीतिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।


