‘मैं चड्ढा नहीं…’, क्या ममता की ‘सयानी’ भी बनीं बागी? काबा-मदीना गाने से आई थीं चर्चा में

 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में राज्य की सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अध्यक्ष ममता बनर्जी को लगातार झटके पर झटके लग रहे हैं। बुधवार को तृणमूल कांग्रेस के अंदर संकट और गहरा गया क्योंकि अब खबर है कि जादवपुर लोकसभा सांसद सयानी घोष भी बागी गुट में शामिल हो गईं हैं। हालांकि, सयानी घोष सोशल मीडिया पर एक्टिव रहती हैं लेकिन इन रिपोर्ट को अभी तक खारिज नहीं किया है।

सूत्रों के मुताबिक, सयानी घोष ने काकोली घोष दस्तीदार से संपर्क किया, अलग हुए गुट को अपना समर्थन दिया और उस गुट के समर्थन वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी पहले से ही अपनी सबसे बड़ी अंदरूनी बगावत का सामना कर रही है। कई सांसद पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं और बागी गुट के साथ जुड़ रहे हैं।

किस बात से नाराज सयानी घोष?

सूत्रों के मुताबिक, सयानी घोष का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस में अब उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि उनकी एक बड़ी शिकायत यह थी कि चुनाव प्रचार के दौरान जब उन पर हमले हुए तो पार्टी नेतृत्व से उन्हें कोई समर्थन नहीं मिला।

खबरों के मुताबिक, उस दौरान उन्हें अकेलापन महसूस हुआ और उनका कहना था कि पार्टी में कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ। कहा जाता है कि उनसे अपना चुनाव प्रचार छोटा करने के लिए भी कहा गया था। इस फैसले ने संगठन के प्रति उनकी नाराजगी और बढ़ा दी।

यह कदम इसलिए भी खास है क्योंकि सयानी को हाल ही में पार्टी की महिला शाखा का प्रमुख नियुक्त किया गया है। इसके बाद वह तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में से एक बन गई हैं।

सयानी घोष से जुड़ा विवाद

बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान गाए गए उनके गाने ‘मेरे दिल में है काबा और आंखों में मदीना’ के लिए काफी चर्चा और विवाद का सामना करना पड़ा था।

इसके अलावा आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले राघव चड्ढा पर सयानी घोष ने एक चुनावी जनसभा के दौरान निशाना साधा था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था, “मैं चड्ढा नहीं हूं जो ‘चड्डी’ बन जाऊंगी, घोष हमेशा घोष ही रहेगा।”

टीएमसी में बढ़ती जा रही बगावत

पार्टी को एक और बड़ा झटका लगने के कुछ ही घंटों बाद यह ताजा दलबदल हुआ है। इससे पहले बुधवार को राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और उच्च सदन की सदस्यता छोड़ दी। पूर्व राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बाद एक हफ्ते में इस्तीफा देने वालीं वे दूसरी सांसद बनीं।

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