पाकुड़ में लेयर बर्ड फार्मिंग से महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, अंडा उत्पादन में पश्चिम बंगाल पर निर्भरता होगी खत्म

 जिले के स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और स्थानीय बाजारों में अंडों की आपूर्ति के लिए वर्षों से पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल पर निर्भरता रही है।

अब यह स्थिति बदलने की ओर है। पाकुड़ जिले के नौ आइएफसी (इंटीग्रेटेड फार्मर क्लस्टर) गांवों में शुरू की गई लेयर बर्ड फार्मिंग परियोजना न केवल जिले को अंडा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रही है, बल्कि महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण आजीविका का भी मजबूत माध्यम बन रही है।

प्रथम चरण में स्थापित किए गए नौ यूनिट

परियोजना के तहत जिले के नौ गांवों में 100-100 लेयर मुर्गियों की क्षमता वाले कुल नौ यूनिट स्थापित किए गए हैं। इन सभी यूनिटों का संचालन स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की महिला सदस्यों द्वारा किया जा रहा है।

इससे महिलाओं को घर की चौखट से बाहर निकलकर स्वरोजगार से जुड़ने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है। प्रत्येक यूनिट की कुल लागत 1,08,560 रुपये है, जिसमें लाभुक महिला का 20 प्रतिशत योगदान 21,712 रुपये है।

एक यूनिट से अंडों की बिक्री से वार्षिक 31,311 रुपये तथा पुललेट (बड़ी हुई चूजियों) की बिक्री से 15,000 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है।

इस प्रकार एक यूनिट से कुल 46,311 रुपये का वार्षिक शुद्ध लाभ अर्जित किया जा सकता है। यह आय ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त आर्थिक संबल साबित हो रही है।

अंडा की बढ़ी उत्पादकता

परियोजना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि स्थानीय स्तर पर अंडों का उत्पादन बढ़ रहा है। इससे स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और मध्याह्न भोजन योजना के लिए ताजे अंडों की उपलब्धता सुनिश्चित हो रही है।

साथ ही स्थानीय बाजारों में भी अंडों की आपूर्ति बढ़ी है, जिससे बाहरी राज्यों पर निर्भरता कम होगी। बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को बेहतर पोषण उपलब्ध कराने में भी यह पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

महिला लाभुकों का कहना है कि पहले उनकी भूमिका घरेलू कार्यों तक सीमित थी, लेकिन अब वे स्वयं आय अर्जित कर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और परिवार के निर्णयों में उनकी भागीदारी भी मजबूत हुई है।

यूनिट का होगा विस्तार

प्रशासन की योजना आने वाले दिनों में इस माडल का विस्तार अन्य गांवों तक करने की है। यदि यह प्रयास सफल रहा तो पाकुड़ न केवल अंडा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक उन्नति और पोषण सुरक्षा का भी नया अध्याय लिखेगा।

यह पहल साबित कर रही है कि छोटे स्तर की कृषि आधारित गतिविधियां भी बड़े सामाजिक और आर्थिक बदलाव का आधार बन सकती हैं।

क्या कहते हैं डीपीएम

जेएसएलपीएस के डीपीएम प्रवीण कुमार मिश्रा का कहना है कि आईएफसी के माध्यम से महिला सशक्तिकरण के साथ साथ जिले में अंडे का उत्पादन बढ़ेगा। धीरे धीरे यूनिट का विस्तार किया जाएगा।

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