SC का बड़ा फैसला, केस कितना भी गंभीर हो; आरोपी से त्वरित सुनवाई का हक छीनना गलत

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 सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक केस की सुनवाई के दौरान मौलिक अधिकारों का हवाला देते हुए आरोपी को बेल दिया। कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि, किसी आरोपी के जल्द सुनवाई के अधिकार को, उस पर लगे आरोपों की गंभीरता के कारण छीना नहीं जा सकता है। सुनवाई में अगर देरी होता है तो वह जमानत का हकदार होगा, यह उसके मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने सुनवाई के दौरान हैरानी जताई। दरअसल, उत्तर प्रदेश में हत्या के एक मामले में एक विचाराधीन कैदी पिछले नौ सालों से जेल में बंद है। इस बात की जानकारी होते ही कोर्ट ने उसे पहली ही सुनवाई में जमानत दे दी और राज्य सरकार की राय भी नहीं मांगी, जो कि किसी मामले का फैसला करने का सामान्य तरीका नहीं है।

बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर आपत्ति जताई

इसके साथ ही बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर भी आपत्ति जताई, जिसमें आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। हाई कोर्ट ने जमानत न देने के आधार के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असली मतलब समझने में नाकाम रहा और इस पर निराशा जताई।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आगे कहा, “ऐसा लगता है कि हाई कोर्ट इस कोर्ट के फैसले का असली मकसद और आधार समझने में नाकाम रहा है। हाई कोर्ट को बस इस बात पर गौर करना चाहिए था कि, याचिकाकर्ता पिछले नौ सालों से एक विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में बंद है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जल्द सुनवाई के अधिकार को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता की जमानत याचिका पर विचार करने के लिए हाई कोर्ट को और क्या चाहिए था?”

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