भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने मंगलवार को ‘हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स’ को लगभग खारिज कर दिया।
इसे सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में हार्वर्ड से पढ़े पूर्व CJI डी वाई चंद्रचूड़ की पहल पर पब्लिश किया था। इसका मकसद जजों और वकीलों को जेंडर से जुड़े अन्यायपूर्ण शब्दों के बारे में जागरूक करना और उनकी मदद करना था।
इसे इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि यह बहुत ज्यादा टेक्निकल और हार्वर्ड-ओरिएंटेड थी और इससे रेप सर्वाइवर्स और आम लोगों को कोई मदद नहीं मिल सकती थी।
जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने क्या कहा?
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की असंवेदनशीलता का खुद संज्ञान लेते हुए एक मामले की कार्रवाई के दौरान कहा कि हैंडबुक में सेक्सुअल असॉल्ट के अलग-अलग पहलुओं को फोरेंसिक मतलब दिया गया है, जिन्हें रेप सर्वाइवर, उसके रिश्तेदार या आम लोग शायद न समझ पाएं।
हाई कोर्ट के फैसले में कहा गया था कि ‘स्तन पकड़ना’ और ‘पायजामें का नाड़ा ढीला करना’ रेप की कोशिश नहीं है।
सीजेआई ने कहा, “यह बहुत ज्यादा हार्वर्ड-ओरिएंटेड है।” इसके साथ ही बेंच ने भोपाल में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को इस मुद्दे पर फिर से विचार करने, एक गाइडलाइन बनाने और सुप्रीम कोर्ट एक रिपोर्ट देने के लिए डोमेन एक्सपर्ट्स, एकेडेमिक्स और वकीलों का एक पैनल बनाने का निर्देश दिया।
बेंच ने कहा, “हम इसे ठीक करने के लिए एमिकस क्यूरी शोभा गुप्ता और सीनियर एडवोकेट एच एस फुल्का समेत वकीलों की मदद लेंगे।” सीजेआई ने कहा कि एक बार इसे फाइनल कर लेने के बाद, एनजेए को इसे हाई कोर्ट जजों के लिए स्टडी मटीरियल बनाना चाहिए, जिन्हें बैच में बुलाया जा सकता है और सेक्सुअल असॉल्ट केस से निपटने के लिए जरूरी सेंसिटिविटी के बारे में ट्रेनिंग दी जा सकती है।
उन्होंने आगे कहा, “सुप्रीम कोर्ट में बैठे हाई कोर्ट के जजों को उपदेश देने का कोई मकसद नहीं है। उन्हें एनजेए में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग मिलनी चाहिए।”


