चुनावी राजनीति में कब कौन किसकी राह का रोड़ा बन जाए और कब वही जीत का रास्ता खोल दे, इसका दिलचस्प उदाहरण दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के परिणाम में देखने को मिला। राजद के अनिल कुमार झा की जीत का गणित भी कुछ ऐसा ही रहा।
इम्तेयाज ने राजद के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाकर अनिल झा की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। हालांकि, जब दूसरी वरीयता के मतों की गिनती शुरू हुई तो कहानी पूरी तरह बदल गई। जिस इम्तेयाज के वोटों से अनिल झा की हार का खतरा मंडरा रहा था, उन्हीं के वोटों ने अंततः उनकी जीत की राह आसान कर दी।
हर राउंड में सर्वेश रहे आगे
पहली वरीयता के मतों की गिनती में भाजपा के सर्वेश कुमार ने लगातार बढ़त बनाए रखी। कभी एक हजार तो कभी डेढ़ हजार मतों का अंतर रहा, लेकिन अनिल झा किसी भी राउंड में इस बढ़त को खत्म नहीं कर सके। इसकी बड़ी वजह मो. इम्तेयाज को मिले 10 हजार से अधिक मत रहे। उन्होंने राजद के एमवाई समीकरण में सेंधमारी कर मुकाबले का पूरा गणित बदल दिया था।
राजद के दिग्गज भी नहीं भेद सके चक्रव्यूह
इम्तेयाज ने अपने चुनावी अभियान की तैयारी काफी पहले से कर रखी थी। दरभंगा और मधुबनी की सीमा से सटे क्षेत्रों में वह पिछले एक वर्ष से सक्रिय थे।
स्थानीय निकाय चुनाव के अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने मजबूत जनाधार तैयार किया। राजद के मो. अली अशरफ फातमी, ललित यादव और अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे दिग्गज नेता भी उनकी रणनीति को भेद नहीं सके।
दूसरी वरीयता ने पलट दिया पूरा खेल
पहली वरीयता के मतों में पिछड़ने के बाद अनिल झा की उम्मीद दूसरी वरीयता की गिनती पर टिकी थी। मतगणना की एलीमिनेशन प्रक्रिया में जब इम्तेयाज के मतों का हस्तांतरण हुआ तो अनिल झा को बड़ा फायदा मिला।
उनके द्वितीय वरीयता के मत अनिल झा के लिए संजीवनी साबित हुए। इस तरह जिस प्रत्याशी के कारण अनिल झा की राह मुश्किल हुई थी, उसी के वोट आखिरकार उनकी जीत का सबसे बड़ा सहारा बन गए।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

