जिले की सियासत में समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही खेमेबंदी पर फिलहाल ब्रेक लगता दिख रहा है। करीब दो दशक से पार्टी की राजनीति को प्रभावित कर रहे दो धड़ों को एक साथ लाने में चाचा शिवपाल यादव की भूमिका अहम मानी जा रही है। लोकसभा चुनाव में बेटे आदित्य यादव को जीत दिलाने के बाद अब वह मिशन-2027 के लिए पार्टी की अंदरूनी गांठें खोलने में जुट गए हैं।
बातचीत के बाद नेताओं के एक-दूसरे को मिठाई खिलाने की तस्वीरें सामने आईं। इसे जिले में सपा की पुरानी गुटबाजी खत्म करने की दिशा में अहम पहल माना जा रहा है।
जिले में सपा की राजनीति लंबे समय से दो खेमों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। एक तरफ जिलाध्यक्ष आशीष यादव और उनके साथ बृजेश यादव का खेमा माना जाता रहा, जबकि दूसरी तरफ आबिद रजा की अपनी राजनीतिक ताकत रही।
गुटबाजी की झलक उस समय भी दिखी थी, जब प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल के जिले में कार्यक्रम के दौरान आबिद रजा समेत कई नेता शामिल नहीं हुए थे। बाद में इन नेताओं के साथ अलग बैठक करनी पड़ी थी।
लोकसभा चुनाव के दौरान शिवपाल यादव ने दोनों पक्षों को साधने की कोशिश की। उन्होंने किसी एक खेमे पर निर्भर रहने के बजाय सभी को साथ रखने की रणनीति अपनाई। इसका सियासी लाभ भी मिला और आदित्य यादव बदायूं से सांसद चुने गए।
लोकसभा चुनाव के बाद आबिद रजा की ओर से शेखूपुर विधानसभा सीट पर दावेदारी ने अंदरूनी खींचतान को और बढ़ा दिया था। इस सीट को आशीष यादव परिवार का पारंपरिक राजनीतिक क्षेत्र माना जाता है।
इसी सीट जो पहले उसहैत थी, उससे उनके पिता बनवारी सिंह, वह खुद और अब बदले परसीमन में शेखूपुर बनी सीट से उनके बेटे हिमांशु यादव विधायक हैं।
ऐसे में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाना सपा के लिए जरूरी हो गया था। अब शिवपाल यादव की पहल को इसी जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी के सामने लक्ष्य सत्ता में वापसी का है।
ऐसे में बदायूं में गुटबाजी पर लगाम लगना सपा के लिए राहत भरा संकेत है। हालांकि, तस्वीरों में दिखी नजदीकी चुनाव तक कितनी कायम रहती है और सीटों की दावेदारी पर सहमति कैसे बनती है, यह आगे की राजनीति और रणनीति तय करेगी।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

