‘एआई से नशा तक, ओटीटी पर नियम जरूरी’, RSS विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक मोहन भागवत की बड़ी बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने नागपुर में मंगलवार को आयोजित विजयदशमी उत्सव को लगभग एक घंटे तक संबोधित करते हुए संघ की शताब्दी वर्ष के दौरान किए गए कार्यों से लेकर विश्व की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डाला। समारोह के मुख्य अतिथि दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त थे। उनके संबोधन की मुख्य बातें।
उन्होंने अपने संबोधन में संत रविदास महाराज की 650वीं जयंती, स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की जन्मशताब्दी और राजनारायण बसु की 200वीं जयंती का उल्लेख किया गया। इन महापुरुषों के जीवन से त्याग, सेवा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक आत्मबोध की प्रेरणा मिलती है।
भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सनातन संस्कृति और जीवन-दृष्टि में निहित है। देशवासियों को अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझकर उसे जीवन में अपनाना चाहिए। भारत की विविधता में एकता का आधार सभी मतों, पंथों, भाषाओं, जातियों और प्रांतों का सम्मान है।
भारतीय परंपरा विविधताओं को स्वीकार करती है तथा समय के अनुसार अप्रासंगिक बातों में परिवर्तन की गुंजाइश रखती है। आत्मविस्मृति, सामाजिक विघटन और आपसी संपर्क की कमी समाज को कमजोर करती है। भारत को अपनी सांस्कृतिक चेतना के आधार पर संगठित होकर राष्ट्र की प्रगति के लिए कार्य करना होगा।
उन्होंने कहा, शताब्दी वर्ष में देशभर में संपर्क, संवाद और सामाजिक जागरण के व्यापक कार्यक्रम आयोजित किए गए। संपर्क अभियान के अंतर्गत 4,61,527 गांवों और 41,076 नगरीय बस्तियों में 10,19,88,511 घरों तक संपर्क किया गया। प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियां 1,117 जिलों में आयोजित की गईं, जिनमें 4,26,497 महिला एवं पुरुष शामिल हुए। इसके अलावा 5,036 खंडों में सद्भावना बैठकें, 34,187 मंडलों में हिंदू सम्मेलन तथा युवा सम्मेलनों में 39,25,225 युवाओं ने भाग लिया।
विदेशों में भी भारत, हिंदू समाज और संघ के कार्यों के बारे में जानकारी देने के लिए संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों से शुरू हुए संपर्क और संवाद को आगे भी निरंतर जारी रखने की आवश्यकता बताई गई।
समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए पंच परिवर्तन की पांच पहल रेखांकित की गईं। सामाजिक समरसता के तहत समाज में भेदभाव समाप्त कर समानता, सम्मान और सद्भाव को बढ़ावा देना है। कुटुंब प्रबोधन द्वारा परिवार में संस्कार, आत्मीयता और जिम्मेदारी की भावना मजबूत करना, पर्यावरण संरक्षण में प्रकृति की रक्षा करना और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाना शामिल है।
स्वबोध एवं स्वदेशी से अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझना और स्वदेशी विचार एवं व्यवहार को प्रोत्साहित करना है, जबकि नागरिक अनुशासन से नागरिक कर्तव्यों का पालन करना और सामाजिक जिम्मेदारी निभाना है। ये पांचों पहल केवल एक वर्ष के कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन में स्थायी परिवर्तन लाने की प्रक्रिया हैं। नियमित अभ्यास से अच्छी आदतें विकसित होती हैं और यही आदतें समाज के स्वभाव में परिवर्तन लाती हैं।
परिवार, विद्यालय और सामाजिक वातावरण से मिलने वाले संस्कारों में कमी चिंता का विषय है। नई पीढ़ी को सही और गलत के बीच अंतर करने का विवेक सिखाना आवश्यक है। ओटीटी प्लेटफार्म की सामग्री को लेकर व्यक्त सामाजिक चिंता पर शासन को विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताते हुए सरकार, प्रशासन और समाज से संयुक्त प्रयास करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा, अभिभावकों को बच्चों में अच्छे संस्कार और जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी चाहिए। युवाओं को भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और नैतिक रूप से सक्षम बनना होगा।
सरसंचालक मोहन भागवत ने कहा, विज्ञान और तकनीक का स्वागत करना चाहिए, लेकिन उनका उपयोग विवेक और नैतिकता के साथ होना चाहिए। तकनीक मानव जीवन को बेहतर बनाने का साधन है, स्वयं जीवन का उद्देश्य नहीं। केवल भौतिक सुविधाओं और उपभोग पर आधारित विकास से पर्यावरण और मानव जीवन को नुकसान हो सकता है।
नेपाल की भीषण आपदा हमारे सामने है और कोलकाता की घटना भी दुखद है। परमाणु तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। भारत को पर्यावरण संरक्षण, नैतिकता, संयम और समन्वय पर आधारित संतुलित विकास का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
हिंदू भाव भारत की राष्ट्रीय चेतना और एकता का महत्वपूर्ण आधार है। इसे किसी विशेष पूजा-पद्धति, भाषा, जाति, खानपान या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं रहना है। आध्यात्मिकता, मानवता और विश्व बंधुत्व इसके प्रमुख लक्षण हैं। मातृभूमि के प्रति भक्ति, समान पूर्वजों की परंपरा का गौरव और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को अपनाना राष्ट्रीय एकता के महत्वपूर्ण आधार हैं।
संगठित और शक्तिशाली हिंदू समाज का निर्माण सभी पंथों के सम्मान तथा राष्ट्रीय एकात्मता के विरुद्ध नहीं है। समाज में समावेशिता, सद्भाव और सदाचार को मजबूत करना आवश्यक है। कैप्टन मच्छर ने जो किया वह स्वाभाविक था।
भारत की विविधता में एकता बनाए रखने के लिए वाणी, व्यवहार और कर्म में सद्भाव दिखाई देना चाहिए। इतिहास से जुड़ी आशंकाओं को वर्तमान सामाजिक संबंधों में अविश्वास और संघर्ष का कारण नहीं बनने देना चाहिए। समाज को उकसाकर झगड़े पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से सावधान रहना चाहिए। सरकार और प्रशासन को नीतियां लागू करते समय नागरिकों के सम्मान और संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए।
आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन पैदा करना। राजनीतिक लाभ, वोट और तात्कालिक लोकप्रियता की अपेक्षा विवेक, सद्भाव और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।
समाज की सभी समस्याओं का समाधान केवल सरकार या आंदोलनों के माध्यम से संभव नहीं है। सामाजिक सहभागिता, संवाद और सामूहिक प्रयासों से भी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। 21 प्रांतों के 210 जिलों के लगभग 1,296 विद्यालयों में स्वयंसेवकों और ग्रामीणों के प्रयासों से सकारात्मक बदलाव देखे गए। इन विद्यालयों में विद्यार्थियों की उपस्थिति, सीखने के स्तर और अभिभावकों की सहभागिता में सुधार का उल्लेख किया गया। ग्रामीणों ने शिक्षा, आधारभूत सुविधाओं, खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों में योगदान दिया। सेवा कार्यों से समाज में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और राष्ट्र निर्माण में सहभागिता की भावना मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
संबोधन में उन्होंने बंगाल विभाजन के विरोध और ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख किया गया। ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की प्रेरणा है। मातृभूमि के प्रति भक्ति, समान पूर्वजों का गौरव और भारतीय संस्कृति के मूल्य समाज को जोड़ते हैं। छोटी-छोटी पहचानों के कारण एकता के साझा आधारों को छोड़ना उचित नहीं है। विविधताओं को अलगाव का कारण मानने के बजाय उनके बीच एकता और अपनत्व को मजबूत करना चाहिए।
उन्होंने कहा, विश्व राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और पर्यावरणीय संकट जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत को अपनी सांस्कृतिक जीवन-दृष्टि और राष्ट्रीय मूल्यों के आधार पर विकास का नया मार्ग प्रस्तुत करना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक न्याय, एकात्मता और प्रगति के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। भारत को विश्व में सुख और शांति का मार्ग दिखाने वाला राष्ट्र बनाने के लिए सामूहिक पुरुषार्थ करना होगा।
भारत का परम वैभव और विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठा प्रत्येक नागरिक के योगदान से संभव होगी। व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव लाकर राष्ट्रसेवा की जा सकती है। आरएसएस पर भी सवाल खड़े किए जाते हैं, जबकि संघ का कार्य शुद्ध सात्विक प्रेम है।
भारत में परिवर्तन की बात की जाती है परंतु यहां न कभी हुआ और न होगा। फ्रांस की चर्चा करते हुए कहा कि वहां क्यों हो रहा है, यह सभी को पता है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

