दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगती है। घरों और दुकानों में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस दौरान मिट्टी, प्लास्टर और अन्य सामग्रियों से बनी गणेश-लक्ष्मी की आकर्षक मूर्तियों की मांग भी बढ़ जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दीपावली पर पूजी जाने वाली इन मूर्तियों को तैयार करने में कारीगरों को महीनों की मेहनत करनी पड़ती है? कुछ जगहों पर मूर्तियां बनाने से लेकर उनकी रंगाई और सजावट तक की प्रक्रिया में करीब आठ महीने तक लग सकते हैं।
कहां बनती हैं गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां?
भारत के कई शहरों और कस्बों में गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है। पश्चिम बंगाल का कोलकाता, खासकर कुम्हारटोली, मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में भी मूर्तिकार दीपावली के लिए विशेष रूप से प्रतिमाएं तैयार करते हैं।
इन स्थानों पर कई परिवार पीढ़ियों से मूर्तियां बनाने के काम से जुड़े हुए हैं। उनके लिए यह केवल कारोबार नहीं, बल्कि पारंपरिक कला और आजीविका का महत्वपूर्ण साधन भी है। त्योहार के मौसम में इन कारीगरों की व्यस्तता बढ़ जाती है और वे महीनों पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं।
आठ महीने तक क्यों चलती है तैयारी?
गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां बनाने का काम केवल मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं है। इसके लिए सबसे पहले उपयुक्त सामग्री जुटाई जाती है। इसके बाद मूर्ति का ढांचा तैयार किया जाता है और उस पर मिट्टी या अन्य निर्धारित सामग्री की परतें चढ़ाई जाती हैं।
मूर्ति का आकार देने के बाद उसे अच्छी तरह सुखाना जरूरी होता है। इसके बाद सतह को चिकना किया जाता है और रंगाई की प्रक्रिया शुरू होती है। आंखों, आभूषणों, वस्त्रों और अन्य बारीकियों को उकेरने में भी काफी समय और कुशलता लगती है।
बड़ी संख्या में मूर्तियां तैयार करने वाले कारीगरों को अलग-अलग चरणों में काम करना पड़ता है। सामग्री की उपलब्धता, मौसम, मूर्तियों के आकार और ऑर्डर की संख्या के आधार पर तैयारी का समय बदल सकता है। इसी वजह से कुछ मूर्ति निर्माण केंद्रों में दीपावली के लिए काम कई महीने पहले शुरू हो जाता है।
रंगाई और सजावट से मिलता है आकर्षक रूप
मूर्तियों को अंतिम रूप देने में रंगों और सजावटी सामग्री की अहम भूमिका होती है। कारीगर भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की प्रतिमाओं को पारंपरिक स्वरूप देने के लिए बारीक चित्रकारी करते हैं। मुकुट, आभूषण, वस्त्र और अन्य सजावटी हिस्सों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
बाजार में अलग-अलग आकार, डिजाइन और कीमतों की मूर्तियां उपलब्ध होती हैं। ग्राहक अपनी पसंद, पूजा की परंपरा और बजट के अनुसार प्रतिमाएं खरीदते हैं। त्योहार के दौरान इन मूर्तियों की मांग बढ़ने से कारीगरों और विक्रेताओं को भी काम मिलता है।
कारीगरों की मेहनत से सजते हैं घर और बाजार
दीपावली पर गणेश-लक्ष्मी की पूजा को लेकर लोगों में विशेष श्रद्धा रहती है। पूजा के लिए खरीदी जाने वाली हर मूर्ति के पीछे कारीगरों की मेहनत, कलात्मक कौशल और पारंपरिक अनुभव जुड़ा होता है। कई परिवारों के लिए दीपावली का मौसम साल की कमाई का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
इस तरह दीपावली पर घरों में स्थापित होने वाली गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां केवल पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि देश की पारंपरिक हस्तकला और कारीगरों की मेहनत का भी प्रतीक हैं।
ध्यान दें: आठ महीने में मूर्तियां तैयार होने की अवधि सभी स्थानों और सभी प्रकार की मूर्तियों पर लागू नहीं होती। किसी विशेष शहर या मूर्तिकला केंद्र के संदर्भ में इस अवधि की पुष्टि संबंधित कारीगरों या स्थानीय स्रोतों से करना जरूरी है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

