जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियां, घने जंगल और प्राकृतिक संपदा इसकी पहचान हैं। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट ने केंद्र शासित प्रदेश के वन क्षेत्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज 7,087 वर्ग किलोमीटर वन भूमि पर वनावरण यानी पेड़ों की छतरी मौजूद नहीं है। यह आंकड़ा जम्मू-कश्मीर में दर्ज वन भूमि और वास्तविक वनावरण के बीच बड़े अंतर को सामने लाता है।
7,087 वर्ग किलोमीटर वन भूमि पर नहीं मिला वनावरण
कश्मीर न्यूज सर्विस की 11 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राजीव गांधी इंस्टीट्यूट फॉर कंटेम्पररी स्टडीज (RGICS) के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। अध्ययन में भारतीय वन सर्वेक्षण की इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में कुल 20,199 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया के रूप में दर्ज है। इसमें से 13,112 वर्ग किलोमीटर भूमि पर वनावरण दर्ज किया गया, जबकि शेष 7,087 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वनावरण नहीं पाया गया। यानी रिकॉर्ड में दर्ज वन भूमि के एक बड़े हिस्से पर पेड़ों की छतरी मौजूद नहीं है।
क्या सरकारी रिकॉर्ड में ही हरे-भरे जंगल?
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद वन भूमि के आधिकारिक रिकॉर्ड और जमीन पर मौजूद वास्तविक वनावरण के बीच अंतर को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि किसी जमीन का सरकारी रिकॉर्ड में वन भूमि के रूप में दर्ज होना और उस पर घने पेड़ों का होना दो अलग-अलग बातें हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में चट्टानी जमीन, ऊंचे पर्वतीय इलाके और प्राकृतिक रूप से कम वनस्पति वाले क्षेत्र भी वन भूमि की श्रेणी में आ सकते हैं। इसलिए 7,087 वर्ग किलोमीटर का आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि इस पूरी जमीन पर हाल के वर्षों में जंगल काटे गए हैं। इसके लिए क्षेत्रवार सर्वेक्षण और भूमि की स्थिति का विस्तृत आकलन जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर के कुल वन क्षेत्र की क्या है स्थिति?
RGICS के अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2023 में जम्मू-कश्मीर का कुल वनावरण 21,346 वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया था। इसमें से 13,112 वर्ग किलोमीटर वनावरण रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया के भीतर था, जबकि 8,234 वर्ग किलोमीटर वनावरण रिकॉर्डेड वन क्षेत्र के बाहर मौजूद था।
ये आंकड़े बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में पेड़ों का वनावरण केवल सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज वन भूमि तक सीमित नहीं है। दूसरी ओर, रिकॉर्डेड वन भूमि का बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां वनावरण दर्ज नहीं किया गया। इस अंतर को समझना वन संरक्षण और पर्यावरणीय योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण और जल सुरक्षा पर भी पड़ सकता है असर
जम्मू-कश्मीर का वन क्षेत्र स्थानीय जल स्रोतों, नदियों, कृषि, बागवानी और ग्रामीण आजीविका के लिए अहम भूमिका निभाता है। जंगलों का क्षरण होने पर मिट्टी के कटाव, जलग्रहण क्षेत्रों की स्थिति और जैव विविधता पर असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार के लिए पांच वर्षों में 19,131 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव भी रखा गया है। इसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी, देशज प्रजातियों के मिश्रित पौधरोपण और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर जोर दिया गया है। यह प्रस्ताव अध्ययन की सिफारिश है, सरकार की ओर से स्वीकृत या जारी की गई राशि नहीं।
अब वन संरक्षण की रणनीति पर नजर
इस अध्ययन ने जम्मू-कश्मीर में वन भूमि की वास्तविक स्थिति का आकलन करने और संरक्षण योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत को रेखांकित किया है। विशेषज्ञों के लिए बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि किन क्षेत्रों में प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण पेड़ नहीं हैं और किन क्षेत्रों में वनावरण बहाल करने की जरूरत है।
निष्कर्ष: जम्मू-कश्मीर की 7,087 वर्ग किलोमीटर वन भूमि पर वनावरण नहीं होने का आंकड़ा पर्यावरण संरक्षण को लेकर अहम सवाल उठाता है। हालांकि, इसे पूरी जमीन पर हाल में पेड़ों की कटाई का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अब जरूरत इस बात की है कि क्षेत्रवार जांच के आधार पर वन भूमि की स्थिति स्पष्ट की जाए और जहां जरूरी हो, वहां वैज्ञानिक तरीके से जंगलों का पुनरुद्धार किया जाए।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

