चेन्नई से सीखा हुनर, बिहार में लॉकडाउन के दौरान शुरू किया कारोबार; 22 कैरेट गोल्ड वाली तंजोर पेंटिंग ने बदली कृष्णा दीदी की जिंदगी

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बिहार की कृष्णा दीदी की कहानी हुनर, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर सामने आती है। चेन्नई में सीखे एक खास कला कौशल को उन्होंने बिहार लौटकर अपने रोजगार का जरिया बनाया। कोरोना काल के दौरान जब कारोबार और रोजगार के सामने मुश्किलें खड़ी थीं, उसी दौर में उन्होंने तंजोर पेंटिंग के हुनर को व्यवसाय में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया।

कृष्णा दीदी ने चेन्नई में तंजोर पेंटिंग की बारीकियां सीखीं। यह दक्षिण भारत की प्रसिद्ध पारंपरिक चित्रकला है, जिसे थंजावुर पेंटिंग भी कहा जाता है। इस कला की खास पहचान उभरे हुए डिजाइन, चमकीले रंग, सजावटी काम और सोने की पन्नी के इस्तेमाल से बनती है। पारंपरिक तंजोर पेंटिंग में 22 कैरेट या उससे अधिक शुद्धता वाली गोल्ड फॉयल का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी मिलती है।

बिहार लौटने के बाद कृष्णा दीदी ने इस कला को सिर्फ शौक तक सीमित नहीं रखा। लॉकडाउन के चुनौतीपूर्ण दौर में उन्होंने इसी हुनर को कारोबार का रूप देने की कोशिश की। धीरे-धीरे उनकी बनाई पेंटिंग्स लोगों तक पहुंचने लगीं और पारंपरिक कला को बाजार से जोड़ने का रास्ता तैयार हुआ।

तंजोर पेंटिंग में धार्मिक और पारंपरिक विषयों को प्रमुखता दी जाती है। देवी-देवताओं के चित्रों के साथ सोने की चमक और उभरी हुई कारीगरी इन पेंटिंग्स को खास बनाती है। इस कला में लकड़ी के आधार पर काम किया जाता है और सजावटी हिस्सों को उभार देने के बाद गोल्ड फॉयल तथा अन्य अलंकरणों का इस्तेमाल किया जाता है।

कृष्णा दीदी की कहानी इस बात को दिखाती है कि किसी दूसरे शहर में सीखा गया हुनर भी अपने घर-क्षेत्र में रोजगार और पहचान का माध्यम बन सकता है। मुश्किल समय में उन्होंने परिस्थितियों के आगे रुकने के बजाय अपने कौशल को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना।

आज तंजोर पेंटिंग उनके लिए सिर्फ कला नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और कारोबार का माध्यम बन चुकी है। उनकी यात्रा उन लोगों के लिए भी प्रेरक है, जो किसी हुनर को सीखकर उसे अपने रोजगार का आधार बनाना चाहते हैं।

पारंपरिक कला को कारोबार से जोड़ने की कोशिश

बिहार में पहले से ही मधुबनी, टिकुली और अन्य पारंपरिक कला शैलियों की समृद्ध परंपरा रही है। राज्य में अलग-अलग हस्तशिल्प और पेंटिंग को बाजार से जोड़ने की कोशिशें भी जारी हैं। हाल के बिहार सरस मेले में तंजोर आर्ट समेत कई पारंपरिक कलाओं को महिला उद्यमियों ने प्रदर्शित किया था।

कृष्णा दीदी की कहानी इसी व्यापक बदलाव की एक मिसाल है, जहां पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ा जा रहा है।

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