हरियाणा की जज से टिंडर पर युवक ने की दोस्ती, ठग लिए 52 लाख रुपये; कोर्ट ने खारिज की जमानत याचिका

टिंडर के जरिए हुई दोस्ती, 52.81 लाख रुपये का ट्रांसफर और हनी ट्रैप के आरोपों से जुड़े मामले में पटियाला हाउस स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने आरोपित दीपक वत्स की जमानत याचिका खारिज कर दी है।

जमानत पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने केवल आरोपित के आचरण पर ही नहीं, बल्कि जांच की दिशा और मामले के प्रस्तुतीकरण पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड कई महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर इशारा करते हैं, लेकिन जांच एजेंसी अब तक कई बुनियादी डिजिटल साक्ष्य जुटाने में विफल रही है।

न्यायिक अधिकारी हर्षाली चौधरी के बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ई-एफआईआर घरेलू सहायिका दीक्षा देवी के नाम पर दर्ज कराई गई थी, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार पांच लाख रुपये के आखिरी कैश को छोड़कर ठगी की अधिकांश रकम हरियाणा में तैनात न्यायिक अधिकारी हर्षाली चौधरी के बैंक खातों से आरोपित तक पहुंची।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बैंक रिकार्ड दर्शाते हैं कि शिकायतकर्ता घरेलू सहायिका दीक्षा देवी के खाते से कोई डिजिटल भुगतान नहीं किया गया। लगभग सभी प्रमुख लेनदेन न्यायिक अधिकारी के खातों से हुए हैं, जो असल में इस मामले के असली पीड़ित हैं। कोर्ट ने कहा कि दीक्षा देवी असल में हरियाणा में तैनात एक न्यायिक अधिकारी की घरेलू सहायिका है।

कोर्ट ने कहा- मामले को पेचीदा बना दिया गया है

कोर्ट ने कहा कि एक मामला जो काफी सीधा-सादा होना चाहिए था उसे तीनों मुख्य किरदारों आरोपित, पीड़ित और जांच अधिकारी के व्यवहार ने उलझाकर पेचीदा बना दिया है। कोर्ट ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी, जिस पर न्याय करने, कानून के सामने सच को बनाए रखने और अपने सामने आने वाले लोगों से पूरे तथ्य पेश करने की उम्मीद करने की गंभीर जिम्मेदारी है, उसने खुद सामने आने के बजाय अपनी घरेलू सहायिका के नाम से शिकायत की।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से दोनों पक्षों के बीच घनिष्ठ संबंधों के संकेत मिलते हैं और मामले की परिस्थितियां उन साइबर अपराधों से मिलती-जुलती प्रतीत होती हैं, जिन्हें आमतौर पर हनी ट्रैप के रूप में देखा जाता है। अदालत ने यह भी पाया कि आरोपित ने अपने पक्ष में केवल एकतरफा वाट्सऐप संदेश पेश किए हैं। साथ ही आरोपित ने जांच एजेंसी को अपने मोबाइल फोन का पासवर्ड भी उपलब्ध नहीं कराया है, जिससे डिजिटल साक्ष्यों की जांच प्रभावित हुई है।

अन्य महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एकत्र नहीं किए गए

अदालत ने जांच अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी असंतोष व्यक्त कर कहा कि अब तक पीड़िता के मोबाइल फोन से पूरी वाट्सएप चैट, टिंडर चैट हिस्ट्री, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एकत्र नहीं किए गए हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि जांच उपलब्ध डिजिटल सामग्री के स्वतंत्र सत्यापन के बिना आगे बढ़ती दिखाई देती है।

कोर्ट ने पांच लाख रुपये की नकद जमा राशि को लेकर भी सवाल उठाए। यह रकम न्यायिक अधिकारी के अदालत के कर्मचारी द्वारा हरियाणा के नारनौल में जमा कराई गई थी। अदालत ने कहा कि धन के वास्तविक स्रोत की स्वतंत्र जांच आवश्यक है और इस संबंध में संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाने चाहिए।

चार सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश

आरोपित की जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने जांच अधिकारी को चार सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी को आइओ या मजिस्ट्रेट के सामने आना चाहिए और पूरा और बिना किसी लाग-लपेट के सच रिकार्ड पर रखना चाहिए।

पुलिस के अनुसार आरोपित ने टिंडर पर खुद को एक गुप्त सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर संपर्क स्थापित किया और बाद में निवेश व अन्य बहानों से बड़ी रकम हासिल कर ली। दूसरी ओर आरोपी का दावा है कि दोनों के बीच सहमति से संबंध थे और धनराशि स्वेच्छा से भेजी गई थी।

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