‘वन डिस्ट्रिक्ट टू प्रोडक्ट’ योजना से बदली उत्तराखंड की तस्वीर, किसानों और महिलाओं की आय में हुआ इजाफादेवभूमि उत्तराखंड के पारंपरिक उत्पादों, कृषि उपज और हस्तशिल्प को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के उद्देश्य से धामी सरकार द्वारा संचालित ‘एक जिला दो उत्पाद’ योजना प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है। राज्य के सभी 13 जिलों के विशिष्ट स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देकर सरकार न केवल किसानों और काश्तकारों की आय बढ़ा रही है, बल्कि पहाड़ों से होने वाले पलायन को रोककर स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के नए द्वार भी खोल रही है। उत्तराखंड की भौगोलिक विविधताओं को ध्यान में रखते हुए इस योजना के तहत प्रत्येक जिले से दो विशिष्ट उत्पादों (एक कृषि/हॉर्टिकल्चर आधारित और दूसरा हस्तशिल्प/प्रसंस्करण आधारित) का चयन किया गया है। इससे राज्य के पारंपरिक उद्योगों को पुनर्जीवन मिला है।
देवभूमि उत्तराखंड के पारंपरिक उत्पादों, कृषि उपज और हस्तशिल्प को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के उद्देश्य से धामी सरकार द्वारा संचालित ‘एक जिला दो उत्पाद’ योजना प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है। राज्य के सभी 13 जिलों के विशिष्ट स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देकर सरकार न केवल किसानों और काश्तकारों की आय बढ़ा रही है, बल्कि पहाड़ों से होने वाले पलायन को रोककर स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के नए द्वार भी खोल रही है।
किसानों और स्थानीय लोगों को मिल रहा फायदा
उत्पादों का उचित मूल्य और सीधी पहुंच: पहले जहां किसानों को अपने फल, मसाले और पारंपरिक खाद्यान्नों को कम दामों में बिचौलियों को बेचना पड़ता था, वहीं अब ‘वन डिस्ट्रिक्ट टू प्रोडक्ट’ योजना के तहत बने प्रोसेसिंग सेंटर्स और ब्रांडिंग के जरिए उन्हें उनकी उपज का सीधा और उचित मूल्य मिल रहा है।
ब्रांडिंग और जीआई टैगिंग: राज्य सरकार ने ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ (House of Himalayas) जैसे एकीकृत अंब्रेला ब्रांड के माध्यम से राज्य के मांडवा (रागी), झंगोरा, पहाड़ी दालें (गहत, भट्ट), अल्मोड़ा की बाल मिठाई, मुनस्यारी का राजमा, पिथोरागढ़ की चूलू का तेल और चमोली के लकड़ी के हस्तशिल्प को विश्वस्तरीय पैकेजिंग और जीआई टैग दिलाकर बाजार में उतारा है।
वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग: किसानों को केवल कच्चा माल बेचने के बजाय उसकी प्रोसेसिंग करके प्रोडक्ट बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। उदाहरण के लिए, सेब या माल्टा उगाने वाले किसान अब उसका जूस, जैम और कैंडी बनाकर अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।
महिला स्वयं सहायता समूहों को संबल: राज्य की हजारों महिलाएं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और इस योजना के समन्वय से हस्तशिल्प, एपण कला, ऊनी वस्त्र और बेकरी उद्योग से जुड़कर हर महीने आत्मनिर्भर बन रही हैं।
योजनाओं से मिल रही मदद
सपनों को मिला नया आसमान
उत्तराखंड की भौगोलिक विविधताओं को ध्यान में रखते हुए इस योजना के तहत प्रत्येक जिले से दो विशिष्ट उत्पादों (एक कृषि/हॉर्टिकल्चर आधारित और दूसरा हस्तशिल्प/प्रसंस्करण आधारित) का चयन किया गया है। इससे राज्य के पारंपरिक उद्योगों को पुनर्जीवन मिला है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

