दिल्ली सरकार की केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) में दवा और चिकित्सा उपकरणों की खरीद में हुए 650 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच में महत्वपूर्ण फाइलों को नष्ट किए जाने का आरोप सामने आया है।
सात फाइलों में छिपी थी घोटाले की कड़ी
1. बेडशीट, पिलो कवर और लिनेन की फाइल
करीब 16.67 लाख वस्तुओं की खरीद और करीब 75 करोड़ रुपये के खर्च का ब्योरा। इससे अस्पतालवार आपूर्ति, स्टाक और वास्तविक खपत का पता चलता।
2. ओआरएस की फाइल
करीब 50 लाख सैशे की खरीद पर करीब 7.50 करोड़ रुपये खर्च का रिकार्ड। इससे पता चलता कि कितने सैशे किस अस्पताल को भेजे गए और कितना स्टाक बचा।
3. पोर्टेबल एक्स-रे मशीन की फाइल
448 मशीनों की खरीद, कीमत, आपूर्ति, स्थापना और अस्पतालवार आवंटन का ब्योरा। इससे यह जांची जा सकती थी कि खरीदी गई सभी मशीनें वास्तव में अस्पतालों में पहुंचीं और स्थापित हुईं या नहीं।
4. सी-आर्म रेडियोलाजी उपकरण की फाइल
सात सी-आर्म मशीनों की करीब 7.70 करोड़ रुपये की खरीद का रिकार्ड। इससे खरीदी गई मशीनों के प्राप्तकर्ता अस्पताल और उनकी वर्तमान स्थिति का पता चलता।
5. एनेस्थीसिया वर्क स्टेशन की फाइल
खरीद, निरीक्षण, आपूर्ति और अस्पतालों में स्थापना से संबंधित विवरण। इससे यह पता चलता कि कितने उपकरण खरीदे गए और वास्तव में कितने अस्पतालों में लगाए गए।
6. सर्जिकल सामग्री की फाइल
100 करोड़ रुपये से अधिक की सर्जिकल सामग्री की खरीद का ब्योरा। इसमें ड्रेसिंग सामग्री, टांके, कैनुला और दस्ताने जैसी सामग्री शामिल थी। इससे खरीद की मात्रा, दर और अस्पतालवार आपूर्ति का मिलान किया जा सकता था।
7. जरूरी दवाओं की फाइल
करीब 400 करोड़ रुपये की दवाओं की खरीद का रिकार्ड। इससे दवाओं की मात्रा, संबंधित कंपनियां, अस्पतालों को आपूर्ति और स्टाक रजिस्टर का मिलान कर यह पता लगाया जा सकता था कि खरीदी गई दवाएं वास्तव में कहां गईं।
448 एक्स-रे मशीनों पर 148 करोड़ खर्च
जांच में पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद पर सवाल उठे हैं। आरोप है कि करीब 10 लाख रुपये की मशीन करीब 33 लाख रुपये प्रति मशीन की दर से खरीदी गई। 448 मशीनों पर करीब 148 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि इनकी अनुमानित बाजार कीमत करीब 45 करोड़ रुपये बताई गई है।
बेडशीट करीब 150 रुपये के बजाय 450 रुपये में खरीदने का आरोप है। इस मद में करीब 75 करोड़ रुपये खर्च किए गए। सी-आर्म करीब 25 लाख रुपये के बजाय 1.10 करोड़ रुपये प्रति मशीन की दर से खरीदे जाने का आरोप है। ओआरएस करीब 2.05 रुपये के बजाय 15 रुपये प्रति सैशे की दर से खरीदने का आरोप है।
18 मई 2026 को जांच टीम सीपीए से रिकार्ड लेने पहुंची थी। उस समय महत्वपूर्ण फाइलें उपलब्ध नहीं कराई गई थीं। अब एसीबी की ओर से कोर्ट में इन्हें नष्ट किए जाने की बात कहे जाने से मामले में साक्ष्य मिटाने का पहलू भी जुड़ गया है।
वहीं, ई-टेंडर, भुगतान, लेखा और स्टाक से जुड़े डिजिटल रिकार्ड के जरिये इन फाइलों में दर्ज कई जानकारियां दोबारा जुटाई जा सकती हैं। इनसे टेंडर तैयार करने से लेकर खरीद की मंजूरी, आपूर्ति और भुगतान पाने वाली कंपनियों तक की पूरी कड़ी जोड़ने में मदद मिलेगी।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

