फरेंदा वन रेंज में 4060 हेक्टेयर में फैला परगापुर ताल, शीत ऋतु में कभी प्रवासी पक्षियों का एक प्रमुख ठिकाना होता था, मगर अब वहां से विदेशी मेहमान रूठ गए हैं। इसका कारण ताल की बदहाली और पक्षियों का शिकार बताया जा रहा है।
वर्षों से विदेशी पक्षियों के कलरव से गूंजने वाले परगापुर ताल में अब महज नाम के विदेशी पक्षी ही नजर आते हैं। इस बार ठंड के मौसम में विदेशी मेहमानों का आगमन ना के बराबर रहा है। ताल में साइबेरियन पक्षी लालसर, टिकिया, पनडुब्बी आदि की बड़ी संख्या में आते हैं। इनके आगमन से चारों तरफ कलरव गूंजता था, ताल के सटे जंगल है जिससे यह ताल पक्षियों को काफी पंसद आता था।
तीन माह ठंड के मौसम में प्रवास करने के बाद मार्च के महीने अपने देश लौट जाते थे, लेकिन शिकारियों की कुदृष्टि के चलते मेहमान पक्षियों ने अपना रास्ता बदल दिया है। ताल के आस पास कच्ची शराब कारोबारियों ने अपना डेरा जमाया हुआ है, लहन के कचरे से ताल का पानी भी दूषित व मनुष्यों की अत्याधिक चहलकदमी से पक्षियों का आवागमन कम होने का कारण बताया जा रहा है। इस बावत रेंजर सुशील चतुर्वेदी ने कहा कि जंगल व पक्षियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान दिया जाता है। इस संबंध में जांच की जाएगी।
कैंपा योजना पर भी लगा ग्रहण:
कैंपा योजना के तहत ताल में ढाई हेक्टेयर में मगरमच्छ व ढाई हेक्टेयर में कछुआ पालने की बात कही गई थी। साथ ही ताल से दो मीटर गहराई तक मिट्टी निकाल कर टीले बनवाने का भी प्रावधान था। जिस पर मगरमच्छ आकर बैठते और वाच टावर के जरिए लोगों को भी देखने की व्यवस्था की गई थी।
ताल के किनारे बबूल के पौधों के भी लगाने की जिक्र थी। ताल में संरक्षण केंद्र बनने के बाद कछुआ और मगरमच्छ देखने के लिए लोगों का आवागमन शुरू हो जाता। धन अवमुक्त ना होने के कारण योजना पर ग्रहण लग गया।

